च्वाइस सेंटर जन सेवा के लिए हैं, नशा परोसने के लिए नहीं!
च्वाइस सेंटर्स को ‘मधुशाला’ बनाने की सोच आत्मघाती है

मोहम्मद अज़हर हनफी, ब्यूरो चीफ
मेरी कलम से
हाल ही में कुछ क्षेत्रों में च्वाइस सेंटर्स (VLE) के माध्यम से शराब वितरण के लाइसेंस की मांग उठ रही है। एक जागरूक नागरिक और समाज का हिस्सा होने के नाते, मैं इस विचार का कड़ा विरोध करता हूँ। हमें यह समझने की जरूरत है कि च्वाइस सेंटर की स्थापना किस उद्देश्य से की गई थी।
विरोध के मुख्य कारण
🔴 पवित्रता और विश्वास का संकट: च्वाइस सेंटर्स पर माताएं, बहनें और बच्चे सरकारी योजनाओं, आधार कार्ड और शिक्षा संबंधी कार्यों के लिए आते हैं। यदि इन केंद्रों पर शराब मिलेगी, तो क्या महिलाएं वहां सुरक्षित और सहज महसूस करेंगी?
🔴 युवा पीढ़ी पर दुष्प्रभाव: च्वाइस सेंटर अक्सर गांवों के बीचों-बीच या स्कूलों के पास होते हैं। वहां शराब की उपलब्धता हमारी नई पीढ़ी को नशे के गर्त में धकेलने जैसा होगा।
🔴 सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस: एक वीएलई (VLE) को समाज में एक ‘शिक्षित डिजिटल उद्यमी’ के रूप में सम्मान मिलता है। क्या हम अपनी पहचान एक ‘शराब विक्रेता’ के रूप में बनाना चाहते हैं?
🔴 अपराध में वृद्धि: ग्रामीण इलाकों में च्वाइस सेंटर्स ही डिजिटल क्रांति का आधार हैं। इन्हें शराब के अड्डे में बदलने से गांवों का शांत माहौल खराब होगा और विवाद व अपराध बढ़ेंगे।
🔴 विकास का गलत रास्ता: आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए नशे का सहारा लेना कतई उचित नहीं है। हमें सरकार से बैंकिंग सेवाओं में कमीशन बढ़ाने, नए डिजिटल प्रोजेक्ट्स लाने और सरकारी कार्यों में प्राथमिकता देने की मांग करनी चाहिए, न कि जहर बेचने की।
